Saturday, July 31, 2010

ANUBHAV KA VIKALP NAHI…….

Experience and age ke importance ko samjhne ke liye chaliye ek chhoti si management ki story ka majha lete hai! Ek baar old woman apne bude paltu shwan k sath jangal me ghumne gai, shwan jangal me old woman k sath ghum raha tha, achanak vah kisi chhote janwar ko dekhta hai or uske pichhe dorta hai, kuchh samay baad use pata chalta hai ki wah jangal me kho gaya. Itne me durse ek yuva chite ki nazar shwan par padti hai or vah teji se shikar karne ki niyat se shwan ki aor dorta lagana shuru kar deta hai. Shwan sochta hai ki aaj to jaan gai. Itne me uski nazar pass pari haddiyon par parti hai.vah chite ki taraf pith karke haddiya chawane lag jata hai. Jaise hi chita pass hai tab shwan jor se chillata hai ki kya swadist chita tha, kash..! yesa ek or chita khane ko milta. Yah sunte hi yuva chita ruk jata hai or khud se kahne lagta hai ki aaj to jaan bach gai nahi to yah shwan mujhe kha jata.Dono par ek bandar ki nazar thi, jo sabkuchh dekh raha tha. Bandar ne socha ki chalo iska faida uthaya jaye or chite ko sach batakar usse suraksha ki gaaranti li jaye. Yuva chite ne jab asliyat jani tab vah gusse se bhar gaya or apni pith par bandar ko bithakar fir se shwan ko khane nikala. Old shwan ne dono ko apni aor aate dekha. Usne hausla nahi khoya or na hi dar ko hawi nahi hone diya. Jaise hi dono pass aaye, usne jor se kaha ki are kaha gaya vo bandar…mujhe bol gaya tha ki khane ke liye ek or chite ko taiyar karke lata hu. Yah sunkar chita bhi bhag gayaor uske pahle bandar vaha se bhag chuka tha .Dosto old shwanne dhairiye or saahas na khokar paristithi ka badi hi nidarta ke sath samna kiya. Vahi yuva chite ke pass taakat hone ke bavjud vah dar gaya. Baat saaf hai kisi bhi kshetra me anubhaw ka koi wikalp nahi hai. Fir chahe vah Engineering ka kshetra ho ya Chikitsa ka ya fir anya koi kshetra . Anubhavi vyakti se jab bhi sikhne ko mile, Uska faida jarur uthaye. Viprit paristithiyo se saamna karne ke liye aapko kitabi gyan nahi, Anubhavi vyakti ka hi saath kaam aayega………………….!

Friday, July 30, 2010

Sukhvendra gautam (Dada) KVS Librarian from Dhule Maharastra


Satish Bisen Librarian Acropolis From Indore M.P.

दुनिया को इस नजर से भी देखें…

दुनिया को देखने का नजरिया लगभग हर आदमी का एक सा ही है। लोग सिर्फ वही देखते हैं जो वास्तव में वे देखना चाहते हैं लेकिन दुनिया को जिस नजर से देखने की जरूरत है, वैसे तो कोई देख ही नहीं पाता। यह बात थोड़ी अटपटी है लेकिन हमारे संतों, ऋषि-मुनियों ने इसे खूब समझा और समझाया है। एक मुस्लिम फकीर का किस्सा तो खासा प्रसिद्ध है।
यह दुनिया एक सराय है। इसलिए फकीरों ने कहा है हम दुनिया में रहें दुनिया हम में न रहे। संसार से जितना लगाव बढ़ता है सांसारिक चीजें बेचैनी के उतने ही सामान हमारे भीतर उतार देती है। बलख के बादशाह इब्राहिम की जिंदगी का एक मशहूर किस्सा है। वे अपने दरबार में बैठे हुए थे। उनका मिजाज फकीरी रहता था। हर बात को गहरे तरीके से सोचते थे। एक बार एक शख्स उनके दरबार में सीधा घुस गया और बादशाह के सिंहासन के पास जाकर इधर-उधर देखने लगा। इब्राहिम ने पूछा क्या देख रहे हैं और क्या चाह रहे हैं। उस शख्स ने फरमाया एक-दो दिन का मुकाम चाहता हूँ। बादशाह बोले शौक से रहिए। उस शख्स ने कहा रह तो जाता लेकिन यह तो सराय है और मुझे सराय में नहीं ठहरना।
बादशाह चौंक गए उन्होंने कहा होश में बात करिए यह सराय नहीं बादशाह का महल है। उस शख्स ने फरमाया यह बताओ क्या तुमसे पहले भी इस जगह कोई रहते थे। बादशाह ने कहा- हाँ, मेरे पिता और उसके पहले मेरे दादा। कई पीढ़ियां इससे गुजर गईं। वह शख्स मुस्कुराया और बोला जब इतने लोग यहाँ रहकर चले गए तो फिर यह सराय नहीं हुई तो और क्या हुई। इसी का नाम तो दुनिया है। है सराय की तरह और हम हमेशा का ठिकाना मान लेते हैं। यहाँ कोई किसी का नहीं होता। मजबूर तमन्नाओं के कदम थक जाते हैं पर कोई किसी को सहारा नहीं देता। बादशाह समझ गए बात गहरी की जा रही है और उन्होंने उस शख्स से पूछा- आप कौन हैं तो पता लगा वे हजरत खिज्र थे। दरअसल हम सब मुसाफिर हैं और मुसाफिर का मकसद मंजिल होता है। अपने मुकाम तक पहुंँचने के लिए कुछ हल्के-फुल्के ठिकाने जरूर ले लेता है लेकिन मुसाफिर भूलता नहीं है कि उसकी मंजिल कौन-सी है। हम सबकी मंजिल वह परमशक्ति है, धर्म का मार्ग कोई भी हो।

कौन थीं कृष्ण की 16100 रानियां?

श्रीकृष्ण का नाम आते ही हमारे मन असीम प्रेम उमड़ता है। सभी जानते हैं कि असंख्य गोपियां थी जो श्रीकृष्ण से अनन्य प्रेम करती थीं। परंतु उनकी शादी श्रीकृष्ण से नहीं हो सकी। श्रीकृष्ण की प्रमुख पटरानी रुकमणी पटरानी रुकमणी सहित उनकी 8 पटरानियां एवं 16100 रानियां थीं। कुछ विद्वानों का यह मत है कि कृष्ण की प्रमुख रानियां तो आठ ही थीं, शेष 16,100 रानियां प्रतीकात्मक थीं। इन्हें वेदों की ऋचाएं माना गया है। ऐसा माना जाता है चारों वेदों में कुल एक लाख श्लोक हैं। इनमें से 80 हजार श्लोक यज्ञ के हैं, चार हजार श्लोक पराशक्तियों के हैं। शेष 16 हजार श्लोक ही गृहस्थों या आम लोगों के उपयोग के अर्थात भक्ति के हैं। इन श्लोकों को ऋचाए कहा गया है, ये ऋचाएं ही भगवान कृष्ण की पत्नियां थीं। श्रीकृष्ण की प्रत्येक रानी से 10-10 पुत्र एवं प्रत्येक रानी से 1-1 पुत्री का जन्म हुआ।

मर्यादा सीखें रामायण से….

रामायण में ऐसे कई गूढ़ रहस्य छिपे हैं जो वर्तमान समय में हमें जीने की सही राह दिखाते हैं। रामायण में मर्यादाओं के पालन पर विशेष जोर दिया गया है। रामायण में ऐसे कई प्रसंग आते हैं जहां भगवान श्रीराम ने मर्यादाओं के पालन के लिए त्याग कर आदर्श उदाहरण पेश किया। श्रीराम ने मर्यादा के पालन के लिए 14 साल का वनवास भी सहज रूप से स्वीकार कर लिया। इसीलिए उन्हें मर्यादापुरुषोत्तम कहा गया।रामायण में ऐसे भी कई प्रसंग आते हैं जहां मर्यादा का पालन न करने पर पराक्रमी व बलशाली को भी मृत्यु का वरण करना पड़ा। जब भगवान राम ने किष्किंधा के राजा बालि का वध किया तो उसने भगवान से प्रश्न पूछा-मैं बेरी सुग्रीव प्याराकारण कवन नाथ मोहि मारा,प्रति उत्तर में जो बात राम ने कही वह मर्यादा के प्रति समर्पण को दर्शाती है-अनुज वधू, भग्नी, सुत नारी,सुन सठ ऐ कन्या सम चारीअर्थात अनुज की पत्नी, छोटी बहन तथा पुत्र की पत्नी। यह सभी पुत्री के समान होती है। तुमने अपने अनुज सुग्रीव की पत्नी को बलात अपने कब्जे में रखा इसीलिए तुम मृत्युदंड के अधिकारी हो।ऐसे ही मानवीय संबंधों को मर्यादाओं में बांधा गया है। इस प्रकार मर्यादाएं व्यक्ति के मन पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालती है। वर्तमान समय में जहां पाश्चात्य सभ्यता हमारे बीच घर करती जा रही हैं वहीं रामायण एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जो हमें मर्यादाओं की शिक्षा दे रहा है।

क्यों मानते हैं अतिथि को भगवान ?

क्या कारण है कि गृहस्थ जीवन को सन्यास से भी अधिक श्रेष्ठ व कठिन माना गया है? एक गृहस्थ व्यक्ति की जिंदगी में अनायास ही सारी तप साधना शामिल है। इसीलिये तो गृहस्थ इंसान बगैर घर-परिवार छोड़े ही जीवन के असली मकसद यानि कि पूर्णता को प्राप्त कर सकता है। जिंदगी के जिस मकसद को पाने की खातिर कोई साधक घर-परिवार ही नहीं पूरा संसार ही छोड़कर सन्यासी बन जाता है। आखिर इतनी अनमोल उपलब्धि दुनियादारी में डूबा हुआ सामान्य व्यक्ति कैसे प्राप्त कर लेता है?
सारा रहस्य गृहस्थ इंसान के कर्तव्यों में छुपा है। इंसानी जिंदगी को जिन चार अनिवार्य और अति महत्वपूर्ण भागों में बांटा गया है, उनमें से दूसरा है- गृहस्थ आश्रम। गृहस्थ में रहकर कुछ कर्तव्यों को करना अनिवार्य बताया गया है। किसी विवाहित या परिवार वाले गृहस्थ इंसान के लिये जिन कार्यों करना निहायत ही जरूरी है वे इस प्रकार हैं-
जीव ऋण: यानि घर आए अतिथि, याचक तथा पशु-पक्षियों का उचित सेवा- सत्कार करना ।देव ऋण: यानि यज्ञ आदि कार्यों द्वारा देवताओं को प्रशन्न एवं पुष्ट करना।शास्त्र ऋण: जिन शास्त्रों या ग्रंथों से हमने ज्ञान-विज्ञान सीखकर जीवन को श्रेष्ठ बनाया है, उनका सम्मान, हिफाजत एवं प्रचार प्रसार करना।पितृ ऋण: यानि कि अपने पूर्वजों और पित्रों की सुख-शांति के लिये शास्त्रोक्त तरीके से श्राद्ध-कर्म का करना।ग्राम ऋण: यानि कि जिस गांव समाज और देश में पल-बढ़कर हम बड़े हुए हैं, उसकी भलाई की खातिर अपनी क्षमता के अनुसार प्रयास करना।

सबके सपनों का अर्थ..

सपने हमें अतार्किक या अगणितीय मालूम पड़ते हैं, लेकिन इनके अपने अर्थ होते हैं। हमारे मन की भीतरी परत में जो चल रहा होता है, ये उसकी ही अभिव्यक्ति होते हैं। हमारे जीवन की घटनाओं-परिस्थितियों से इनका सीधा सरोकार रहता है। यह अचेतन मन की भाषा है, इनके माध्यम से अचेतन संवाद करता है, लेकिन प्रतीक रूप में। सालों से अध्ययनकर्ता सपनों को समझने, उसकी व्याख्या करने में लगे थे।
इस दौरान उन्हें कुछ दिलचस्प चीजों पता चलीं। उन्होंने पाया कि कुछ ऐसे सपने हैं, जिन्हें कमोबेश हर इंसान कभी न कभी देखता है। जैसे सबसे आम सपना ख़ुद को नीचे गिरते या डूबते देखने का है। इस तरह का सपना वे लोग देखते हैं, जिन्हें असुरक्षाबोध हो या व्यावहारिक जीवन में सहयोग नहीं मिल रहा है। वैसे, काम या भावनाओं के हावी होने पर भी इस तरह के सपने आते हैं।
इसी तरह, ख़ुद को नग्न-अर्धनग्न या ग़ैरतुकी ड्रेस (जैसे ऑफिस में पायजामा पहने हुए) पहने हुए सपना भी बहुत लोग देखते हैं। इस तरह का सपना व्याकुलता या शर्म का परिचायक है। लेकिन इससे गर्व या स्वतंत्रता की भावना भी छिपी हो सकती है। इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि व्यावहारिक जीवन में आप ख़ुद को ज्यादा प्रदर्शित कर चुके हैं या अपनी गोपनीय जानकारी बता चुके हैं। बहुत से लोग सपने में अपना मुंह खोलते हैं और पाते हैं उनके दांत नहीं हैं, या झड़ना शुरू हो चुके हैं। इसका सामान्य अर्थ यह है कि हम बुरे दिखने को लेकर हुए डरे हैं। लेकिन गहरा अर्थ व्यावहारिक जिंदगी में शक्तिहीन होने का भय है।
सपनों में भी भय की मनोग्रंथि का दख़ल रहता है। अधिकांश लोगों को पीछा किए जाने के सपने आते हैं। यह सपना बताता है कि हम किसी व्यक्ति या वस्तु को लेकर आशंकित या डरे हुए हैं। वैसे ये सपने अर्थहीन भी हो सकते हैं, वास्तविक जिंदगी में घटी घटना के प्रभाव से भी व्यक्ति इस तरह का सपना देखता है। अगर आप इस तरह का सपना देख रहे हैं, जिसमें आप या आपका प्रिय पात्र बीमार है, जख्मी है या मर रहा है.. तो इसका मतलब है कि आप भावनात्मक रूप से आहत हैं या फिर अपमानित होने का भय आपको सता रहा है।
इसमें चेतावनी भी है कि या तो आपको या आपके प्रियजन को कोई शारीरिक पीड़ा आने वाली है। परीक्षा में फेल होने का सपना भी लोगों को अक्सर आता है। मजे की बात यह है कि ये सपने उन्हें भी आते हैं, जिनका स्कूल-कॉलेज से नाता टूटे काफ़ी अरसा हो गया है। इसका मतलब है, आपको लग रहा है कि आप अपनी लाइफ में कुछ ग़लत निर्णय ले रहे हैं या आपको परखा जा रहा है।